170 साल बाद भी भोगनाडीह में हूल जारी है: क्या वीर सिदो-कान्हू की धरती आज भी आज़ाद नहीं?
आज से करीब 170 वर्ष पहले वीर सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और वीरांगना फूलो-झानो ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जिस हूल विद्रोह की शुरुआत की थी, उसका उद्देश्य सिर्फ सत्ता बदलना नहीं, बल्कि आदिवासी स्वाभिमान और स्वशासन था।


विडंबना देखिए कि आज़ादी के सात दशक बाद भी वही भोगनाडीह एक बार फिर सवालों के घेरे में है—इस बार किसी विदेशी हुकूमत से नहीं, बल्कि अपने ही तंत्र से।
हूल की विरासत और प्रशासन की आपत्ति

वीर सिदो-कान्हू के वंशज श्री मंडल मुर्मू द्वारा संचालित संस्था “वीर सिदो-कान्हू हूल फाउंडेशन” ने जून 2025 में हूल दिवस पर एक गैर-राजनीतिक सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करने की घोषणा की थी।
करीब एक महीने तक अनुमति का आवेदन लटकाने के बाद जिला प्रशासन ने यह कहते हुए अनुमति देने से इनकार कर दिया कि उसी दिन बगल में एक सरकारी कार्यक्रम प्रस्तावित है।

जबकि वास्तविकता यह है कि इससे पहले उसी क्षेत्र में भाजपा और झामुमो जैसे दलों के कार्यक्रम बिना किसी प्रशासनिक अड़चन के हो चुके हैं। सवाल यह है कि जब राजनीतिक कार्यक्रम संभव हैं, तो एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक आयोजन से प्रशासन को आपत्ति क्यों?
ग्रामसभा की मंजूरी के बावजूद आधी रात की कार्रवाई
भोगनाडीह गांव पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में आता है और यहां ग्रामसभा को विशेष अधिकार प्राप्त हैं। ग्रामसभा की स्पष्ट अनुमति के बावजूद, पुलिस द्वारा आधी रात को शहीद परिवार द्वारा बनाए जा रहे पंडाल को तोड़ दिया गया।
हूल दिवस की सुबह जब वंशज मांझीथान/जाहेरस्थान से पूजा कर लौटे, उससे पहले ही प्रशासन ने वीर सिदो-कान्हू पार्क का ताला तोड़ दिया।
इस पर सवाल पूछने पहुंचे ग्रामीणों को जवाब मिला—लाठीचार्ज और आंसू गैस।
बाद में पूरे घटनाक्रम का दोष मांझी बाबा, वंशजों और ग्रामीणों पर डालते हुए कई लोगों को जेल भेज दिया गया।
22 दिसंबर: संथाल परगना स्थापना दिवस भी विवादों में
हर वर्ष 22 दिसंबर को संथाल परगना स्थापना दिवस के अवसर पर भोगनाडीह में खेल-कूद और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित होते रहे हैं।
पिछले वर्षों में प्रशासन को इस आयोजन से कभी कोई समस्या नहीं रही।
लेकिन इस बार, जब कार्यक्रम में चम्पाई सोरेन को मुख्य अतिथि आमंत्रित किया गया, तब अचानक प्रशासनिक सख्ती शुरू हो गई।
अजीब-गरीब शर्तें और प्रशासनिक घेराबंदी
कार्यक्रम की अनुमति के नाम पर ऐसी शर्तें लगाई गईं, जो पहले कभी नहीं देखी गईं—
• खेल मैदान में दो-दो मजिस्ट्रेट की तैनाती
• 30 वॉलंटियरों की सूची आधार कार्ड के साथ थाने में जमा करने की बाध्यता
• मैदान से बाहर अलग निकास द्वार (गेट) बनाने की अनुमति से इनकार
• ट्रैफिक नियंत्रण, नशा मुक्ति और जुआ-सट्टा रोकने की जिम्मेदारी आयोजकों पर डालना
• यहां तक कि आयोजक के घर पर मजिस्ट्रेट की तैनाती
सवाल उठता है कि यदि यह सब आयोजकों को ही करना है, तो फिर पुलिस-प्रशासन की भूमिका क्या केवल दमनात्मक कार्रवाई तक सीमित रह गई है?
सिर्फ साहिबगंज में ही क्यों समस्या?
झारखंड के अन्य जिलों—गोड्डा, जामताड़ा, पाकुड़, देवघर, चाईबासा, लोहरदगा—सहित राज्य से बाहर भी ऐसे कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से होते रहे हैं।
तो फिर सवाल यह है कि साहिबगंज में ही बार-बार अड़चन क्यों?
चूंकि पिछले वर्ष बिना किसी विवाद के यह कार्यक्रम संपन्न हुआ था, इसलिए यह आशंका गहराती जा रही है कि चम्पाई सोरेन के साहिबगंज जिले में कार्यक्रम करने पर अघोषित प्रतिबंध लगाया गया है।
यदि ऐसा है, तो सरकार को चाहिए कि वह इस पर आधिकारिक स्पष्टीकरण दे।
हाई कोर्ट से बचने की रणनीति?
आरोप यह भी है कि कार्यक्रम की अनुमति को जानबूझ कर शनिवार शाम तक लंबित रखा गया, ताकि आयोजक इसके खिलाफ हाई कोर्ट का दरवाजा न खटखटा सकें।
नगड़ी आंदोलन की याद और खुली चेतावनी
नगड़ी आंदोलन का उदाहरण देते हुए कहा गया कि
सरकार ने तब भी ताकत का इस्तेमाल किया था, लेकिन अंततः जनता की एकजुटता के आगे उसे पीछे हटना पड़ा।
अब चेतावनी साफ है—
यदि सरकार वही भाषा समझती है, तो आंदोलन भी उसी स्तर पर जाएगा।
30 जून: हूल दिवस पर आर-पार की घोषणा
आगामी 30 जून, हूल दिवस पर
झारखंड, बंगाल, बिहार और ओडिशा से लाखों आदिवासियों के भोगनाडीह पहुंचने की घोषणा की गई है।
यह सिर्फ एक आयोजन नहीं, बल्कि
आदिवासी अस्मिता, स्वशासन और संवैधानिक अधिकारों की लड़ाई बनती जा रही है।
अब सवाल सत्ता से है…
क्या आज़ाद भारत में
वीर सिदो-कान्हू की धरती पर
उनके वंशजों को
अपने ही पूर्वजों को याद करने की अनुमति भी मांगनी पड़ेगी?
या फिर इतिहास एक बार फिर
हूल के रूप में खुद को दोहराएगा?

