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आधुनिक भारत में भी सारंगपोसी के ग्रामीण नाला में चुँआ खोद कर पी रहे पानी

नाला का जलस्तर घटने पर जगह बदल बदल कर बनाते हैँ चुंआ 

 

 

भारत आज 21वीं सदी में जी रहा है। आजादी के 78 वर्ष भी पूरे हो गए। परंतु ग्रामीण भारत की तस्वीर व तकदीर आज भी नहीं बदली। अभी भी ग्रामीण बुनियादी जरूरतों से जूझ रहे हैं। शुद्ध पेयजल को लेकर ग्रामीण क्षेत्र में हाहाकार मची है। सरकार नल जल योजना से ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने का लाख दावा कर ले परंतु हकीकत बिल्कुल उलट है। हम बात कर रहे हैं सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत सारंगपोसी गांव की। सारंगपोसी के ग्रामीण आज भी पेयजल को लेकर जद्दोजहद करते हैं। सारंगपोसी गांव राजनगर जिला मुख्य मुख्यालय को जोड़ने वाली मुख्य मार्ग पर अवस्थित है। आए दिन बीडीओ, सीओ, उपायुक्त, नेता, मंत्री से लेकर तमाम आला अधिकारियों का इस गांव से होकर आना जाना लगा रहता है। परन्तु किसी भी अधिकारी या जनप्रतिनिधियों की नजर पेयजल से जूझते सारंगपोसी के ग्रामीणों पर नहीं पड़ी। गर्मियों में तो पेयजल की और ज्यादा संकट गहरा जाती है।

 

सुबह से पानी के लिए लगती है लाइन कटोरी से निकल कर डेकची व टीना में भरते हैं जल 

 

सारंगपोसो के ग्रामीणों की दिनचर्या की शुरुआत सबसे पहले घर के लिए पेयजल लाने से होती है। महिलाएं डेकची व पुरुष साईकिल में टीना व डब्बू लटकाकर नाला में बनी चुंआ से पानी लाने जाते हैं। साथ में कटोरी भी लेकर जाना पड़ता है, जिससे चुँआ से पानी निकल कर डेकची, डब्बू या टीना में भरते हैं। इस दौरान लम्बी लाइन लगती है। ग्रामीण बताते हैं जैसे जैसे नाला का जलस्तर घटता जगह बदल बदल कर चुँआ खोदते हैं और पानी संग्रह करते हैं। ग्रामीणों के अनुसार चुँआ का पानी इतना शुद्ध व मिठास है कि कपड़े से छानने की जरूरत नहीं पड़ती। पानी से आज तक किसी को डायरिया जैसे कुई बीमारी भी नहीं हुई है। जबकि चापाकल का पानी खारा व लाल निकलता है, जिसका उपयोग ग्रामीण नहीं करते हैं।

 

डूंगरीटोला में एक भी चापाकल नहीं, पूरे गांव में मात्र तीन चापाकल जिसमें एक स्कूल का है 

 

सारंगपोसी गांव में मात्र तीन ही सरकारी चापाकल है। जिसमें से एक उत्क्रमित मध्य विद्यालय का है। दूसरा नीचे टोला में जबकि तीसरा जाहेरथान में है। गांव की आबादी लगभग छह से सात सौ होगी। वहीं डूंगरीटोला में लगभग 30 घरों में दो से ढाई सौ की आबादी रहती है। परंतु एक भी चापाकल नहीं है। ग्रामीण डूंगरी टोला में नया चापाकल गाड़ने की मांग कर रहे हैं। ग्रामीणों की कोई सुन नहीं रहा है।

 

क्या कहते हैं ग्रामीण 

 

1. अजित मार्डी – गांव में पेयजल को लेकर बहुत संकट है। हमारे डूंगरीटोला में एक भी चापाकल नहीं है। चापाकल बहुत जरुरी है। पंचायत के मुखिया भी हमारे गांव को ध्यान नहीं देते, कहते हैं हमको आपलोग वोट नहीं दिए। नाला का पानी मिठास है। सरकार कोई योजना बनाकर वही पानी पाइपलाइन के माध्यम से घरों में पहुंचाए तो बहुत अच्छा होगा।

 

2. ममता मार्डी – हमारे टोला में कोई चापकल नहीं है। चुँआ से पानी लेकर खाना बनाते हैं। चापाकल का पानी लाल व खारा होता है। पीने योग्य नहीं है। 

 

3. अनिता टुडू – सुबह से पानी के लिए लाइन लगते हैं। कटोरी से पानी भरते हैं। चापाकल का पानी मीठा नहीं है। गर्मी में पानी के लिए बहुत समस्या होती है। सरकार ध्यान नहीं दे रही है। 

 

4. राजा टुडू – हमारी दिन की शुरुआत पानी का इंतजाम करने से शुरु होती है। सुबह सुबह साईकिल पकड़ नाला में जाते हैं। टीना व डब्बू में भरकर पानी लाते हैं। कोई नेता मंत्री हमारी हालात पर तरस नहीं खाते। 

 

5. बाले हांसदा – हमलोग बचपन से इसी नाले में चुँआ बनाकर पीते हुए बूढ़ा हो गए हैं। हमारे गांव से होते हुए तितिरबिला से पाइपलाइन से पानी दूसरे गावों में जा रहा है, मगर हमें सुविधा नहीं दी गई है।

 

6. अनिल मार्डी – महिलाओं को पानी लाने में दिक्क़त होता है। जिस घर में बूढ़ी मां है। उन्हें नाला से पानी लाने में दिक्क़त होती है। इसलिए हम लड़के ही साईकिल से टीना व डब्बा में पानी भर कर लाते हैं। सरकार को पेयजल की व्यवस्था करनी चाहिए। 

 

7.संजय टुडू – सरकार कहती है घर घर नल से पानी पहुंचा रहे हैं। परन्तु लोग तो बचपन से अपनी गांव की हालात देख रहे हैं। गर्मी, सर्दी या बरसात हो। हमलोग भोर सुबह ही उठकर पानी लाने जाते हैं। 

 

8. रामजीत हांसदा – सालों से हमारे गांव में पेयजल को लेकर समस्या जस का तस है। कोई नेता मंत्री या मुखिया पेयजल की समस्या समाधान के लिए गंभीर नहीं हैं। हमारी पीढ़ी तो गुजर रही है, लगता है आने वाली पीढ़ी को भी इसी नाले का पानी ही पीना पड़ेगा।

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