चाईबासा के संजय कच्छप ने लाइब्रेरी आंदोलन से बदली हजारों बच्चों की राह
चाईबासा(प्रकाश कुमार गुप्ता): अगर कुछ कर गुजरने की सच्ची इच्छा हो, तो इंसान न समय देखता है और न ही परिस्थितियां। ऐसा ही एक उदाहरण हैं चाईबासा के पुलहातु निवासी संजय कच्छप, जिन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में लाइब्रेरी को एक जनआंदोलन का रूप दे दिया है। उनका सपना है कि देश का कोई भी बच्चा अनपढ़ न रहे और किसी भी विद्यार्थी की पढ़ाई केवल किताबों की कमी के कारण न रुके।


संजय कच्छप बताते हैं कि छात्र जीवन में उनकी आर्थिक स्थिति कमजोर थी। पुस्तकों की कमी के कारण वे भारतीय प्रशासनिक सेवा की तैयारी पूरी नहीं कर सके। हालांकि वर्तमान में वे पाकुड़ जिले में कृषि विभाग के पदाधिकारी के रूप में कार्यरत हैं, लेकिन अपने अधूरे सपने को उन्होंने हजारों बच्चों के भविष्य से जोड़ दिया।

उनके प्रयास से आज पूरे झारखंड में 50 से अधिक डिजिटल लाइब्रेरी संचालित हो रही हैं, जिन्हें वे स्वयं और उनके सहयोगी मिलकर चला रहे हैं। उनकी इस अनूठी पहल की सराहना प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने लोकप्रिय कार्यक्रम “मन की बात” में की थी और उन्हें “लाइब्रेरीमैन” की संज्ञा दी थी। शिक्षा के प्रति उनके समर्पण को देखते हुए प्रधानमंत्री ने उन्हें दो बार गणतंत्र दिवस समारोह में अतिथि के रूप में आमंत्रित भी किया।
इसके अलावा राज्य सरकार और विभिन्न समाचार पत्र-पत्रिकाओं एवं संस्थानों द्वारा उन्हें कई बार सम्मानित किया जा चुका है।
वर्तमान समय में संजय कच्छप पाकुड़ में चलंत पुस्तकालय (मोबाइल लाइब्रेरी) चला रहे हैं। वे सड़क किनारे स्टॉल लगाकर राह चलते लोगों को पुस्तकों के महत्व से अवगत करा रहे हैं और ग्रामीण क्षेत्रों में लाइब्रेरी खोलने के लिए लोगों को प्रेरित कर रहे हैं।

वे बताते हैं कि छुट्टियों के दिनों में अपनी निजी गाड़ी से किताबें लेकर गांव, मोहल्लों और देहातों में पुस्तकालय आंदोलन का प्रचार करते हैं। एक जनवरी को उन्होंने सिद्धू-कानू पार्क, पाकुड़ के पास स्टॉल लगाकर घूमने आए युवाओं को किताबों से जोड़ने का प्रयास किया।
संजय कच्छप का मानना है, “शिक्षा ऐसी धारा है, जो हर जुर्म को मारा है, शिक्षा देती है रोजी-रोटी, शिक्षा ही किनारा है।” इसी सोच के साथ वे ग्रामीण और गरीब बच्चों के जीवन में शिक्षा की ज्योति जलाने के लिए लगातार प्रयासरत हैं।

