झारखंड के दिशोम गुरु शिबू सोरेन की अंतिम यात्रा आज से, रांची से नेमरा तक उमड़ेगा जनसैलाब, झारखंड करेगा अपने जननायक को अंतिम विदाई
झारखंड की राजनीति के सबसे मजबूत स्तंभों में से एक और आदिवासी समाज के प्रतीक रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन का पार्थिव शरीर आज विशेष विमान से राजधानी रांची लाया जाएगा। एयरपोर्ट से शव को सीधे मोरहाबादी स्थित उनके सरकारी आवास पर ले जाया जाएगा, जहां परिवार, करीबी सहयोगी और आमजन उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।


मंगलवार को गुरुजी का पार्थिव शरीर पहले झारखंड विधानसभा भवन ले जाया जाएगा, जहां राज्यपाल, मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, कैबिनेट मंत्री, विधायक और अन्य जनप्रतिनिधि उन्हें राजकीय सम्मान के साथ श्रद्धांजलि देंगे। इसके बाद पार्थिव शरीर झारखंड मुक्ति मोर्चा के केंद्रीय कार्यालय लाया जाएगा, जहां पार्टी कार्यकर्ता, नेता और समर्थक उन्हें अंतिम विदाई देंगे।
अंत में, उनका पार्थिव शरीर रामगढ़ जिले स्थित उनके पैतृक गांव नेमरा ले जाया जाएगा, जहां पारिवारिक रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार किया जाएगा।
81 वर्षीय शिबू सोरेन का रविवार को दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल में निधन हो गया। उनके निधन के साथ ही एक युग का अंत हो गया है।
शिबू सोरेन के निधन पर राज्य सरकार ने तीन दिन के राजकीय शोक की घोषणा की है। इस दौरान 4 और 5 अगस्त को सभी सरकारी कार्यालय बंद रहेंगे और राष्ट्रीय ध्वज आधा झुका रहेगा। साथ ही, किसी भी प्रकार का राजकीय समारोह आयोजित नहीं किया जाएगा।
विधानसभा सचिवालय ने जानकारी दी है कि झारखंड विधानसभा का मानसून सत्र भी अनिश्चितकाल के लिए स्थगित कर दिया गया है। विधानसभा अध्यक्ष रबींद्रनाथ महतो ने कहा कि यह झारखंड के इतिहास में अत्यंत दुखद और शोकपूर्ण दिन है, क्योंकि राज्य ने अपना महान नेता खो दिया है।
शिबू सोरेन का जन्म रामगढ़ जिले के नेमरा गांव में हुआ था। उनके पिता सोबरन सोरेन की हत्या महाजनों ने कर दी थी, जिसके बाद उन्होंने अन्याय के खिलाफ आवाज उठाने का प्रण लिया। पढ़ाई के दौरान ही उन्होंने साहूकारी प्रथा के खिलाफ आदिवासी समाज को संगठित करना शुरू किया और ‘धान कटनी आंदोलन’ के ज़रिए बड़ी सामाजिक चेतना पैदा की।
बाद में उन्होंने अलग झारखंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलन किया और झारखंड मुक्ति मोर्चा की स्थापना की। अपने लंबे राजनीतिक जीवन में शिबू सोरेन आठ बार लोकसभा सांसद, दो बार झारखंड के मुख्यमंत्री और निधन के समय राज्यसभा सांसद के रूप में कार्यरत थे।
जनता उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि एक आंदोलन, एक विचार और एक जनक्रांति के प्रतीक के रूप में देखती है। आज जब झारखंड उन्हें अंतिम विदाई देगा, तो हर आंख नम और हर दिल शोकाकुल होगा।

