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खरसावां में कुड़मी समाज ने 6 सितंबर को अधिकार और पहचान की लड़ाई के लिए काला दिवस मनाया 

 

शनिवार को खरसावां स्थित अर्जूना स्टेडियम में कुड़मी समाज के कुड़माली छात्र-छात्राएं एवं शिक्षकों ने काला रिबन लगाकर आज का दिन को ‘काला दिवस’ के रूप में मनाया. मौके पर शिक्षक गुणधाम मुतरुआर ने कहा कुड़मी समाज के लिए हर वर्ष 6 सितंबर का दिन केवल कैलेंडर की एक तारीख भर नहीं है, बल्कि यह एक गहरे दर्द और ऐतिहासिक अन्याय की स्मृति है.इसी दिन वर्ष 1950 में भारत सरकार ने कुड़मी जाति को अनुसूचित जनजाति (एसटी)की सूची से हटा दिया था.

 

शिक्षक सुनील कुमार जुरुआर ने कहा कि 2 मई 1913/ 550 अधिसूचना के तहत भारत में ब्रिटिश शासन काल के दौरान छोटा नागपुर क्षेत्र में 1931 से 50 तक अनुसूचित जनजाति सूची में कुड़मी समाज सूचीबद्ध थी.लेकिन आजाद भारत में 6 सितंबर 1950 को एसटी, एससी और ओबीसी कैटेगरी जब बनी, तब कुड़मी को अनुसूचित जनजाति के सूची से हटा दिया गया.वह भी बिना कोई अधिसूचना जारी किए. तब से कुड़मी समाज अपने को अब तक अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के लिए आंदोलन करता आ रहा है.वोकेशनल शिक्षक टूरिज्म एंड हॉस्पिटैलिटी के प्रभात कुमार महतो ने कहा कि हमारे यह समुदाय न केवल संवैधानिक अधिकारों से वंचित हुआ, बल्कि अपनी पहचान के संकट से भी जूझते रहे. यही कारण है कि कुड़मी समाज इस दिन को काला दिवस के रूप में मनाते है. वर्षों से हमारी समाज अपने पूर्व अधिकार और पहचान की बहाली के लिए संघर्ष करता आ रहा है.आंदोलनों में रेल टेका, डहर छेंका, धरना प्रदर्शन और काला दिवस जैसे आयोजन इसी संघर्ष के गवाही देते हैं.इसलिए प्रत्येक वर्ष 6 सितंबर को काला दिवस मनाकर कुड़मी समाज सरकार को यह संदेश देता है कि हमारा संघर्ष अभी समाप्त नहीं हुआ है.

यह संघर्ष केवल विरोध का प्रतीक नहीं, बल्कि यह एक सामूहिक संकल्प का अवसर भी है – अपनी पहचान और अधिकारों की पुनर्स्थापित के लिए. इस अवसर पर समाज सरकार से यह मांग करता है कि कुड़मी जाति को पुनः अनुसूचित जनजाति की सूची में शामिल किया जाए.मौके पर खुशबू महतो, राखी महतो, चंदन महतो, करण महतो, अशोक महतो, मंगल महतो, रूपेश महतो, मोहित महतो, प्रकाश महतो, सुकेश , सत्यनारायण महतो, साहिल महतो, धीरज महतो, इंद्रजीत महतो आदि छात्र-छात्राओं ने काला दिवस मनाकर सरकार को संदेश देने का काम किया है.

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