क्या कानून से ऊपर हैं जिला परिषद उपाध्यक्ष मधुश्री महतो?
ईचागढ़: नीमडीह थाना क्षेत्र अंतर्गत सिरूम चौक पर शुक्रवार देर रात जो हुआ, वह कानून, लोकतंत्र और जनप्रतिनिधियों की भूमिका, तीनों पर सवाल खड़े करता है। जिला परिषद उपाध्यक्ष मधुश्री महतो ने दो बालू लदे हाइवा वाहनों को “अवैध” घोषित कर जबरन रुकवाया, खुद ही चालकों से पूछताछ की, और अपनी टीम के ज़रिए पूरे घटनाक्रम को फेसबुक पर लाइव करवाया।


चौंकाने वाली बात यह रही कि उन्होंने अपने कुछ कार्यकर्ताओं को “पत्रकार” घोषित कर फेसबुक लाइव कराया, जिसमें आदिवासी चालकों और खलासियों को कथित तौर पर प्रताड़ित भी किया गया।
सवाल
क्या एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि को यह अधिकार है कि वह बिना किसी प्रशासनिक आदेश या अनुमति के सड़क पर वाहनों को रोके, चालान मांगे और उन्हें अवैध घोषित करे?
यह कोई अधिकृत जांच या सरकारी छापा नहीं था, न ही मधुश्री महतो के पास कोई वैधानिक शक्ति थी। फिर भी उन्होंने सड़क को ‘मंच’ बना लिया और कैमरे के सामने कानून की भूमिका में आ गईं।
लोकतंत्र या निजी प्रचार?
जनप्रतिनिधि का काम जनसेवा करना होता है, न कि लाइव स्टंट करना। यदि हर प्रतिनिधि गाड़ियाँ रोकने लगे, चालान पूछे, और खुद फैसला सुनाए, तो प्रशासन का क्या कार्य रहेगा?
क्या अब जनप्रतिनिधि थाना, अधिकारी और न्यायालय, तीनों बन बैठेंगे?
क्या कहता है कानून और खनन विभाग?
NGT के निर्देश के बाद नदी से बालू खनन और परिवहन पर रोक है, लेकिन खनन विभाग के विशेषज्ञों के अनुसार, पूर्व से अधिकृत डंप में रखा गया बालू NGT के बाद भी वैध तरीके से परिवहन किया जा सकता है, यदि उसका चालान मौजूद हो।
डंप संचालक को ऑनलाइन चालान निर्गत होता है और उसी आधार पर गाड़ियां चलती हैं।
तो क्या मधुश्री महतो को इसकी जानकारी नहीं थी?
या फिर कहीं कोई “कमीशन खेल” चल रहा है, जिसमें गाड़ियों को रोककर सौदेबाज़ी का दबाव बनाया जा रहा हो?
यदि चालान और वैधता तय करने का अधिकार किसी जिला परिषद उपाध्यक्ष को मिल जाए, तो क्या यह लोकतंत्र का अपमान नहीं?
मधुश्री महतो को तय करना होगा कि वे जनप्रतिनिधि हैं या स्वयंभू कानून अधिकारी?
जनसेवा और जनदिखावा में फर्क जनता भी समझती है और समय आने पर जवाब भी देती है।


