पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में नगरपालिका चुनाव के विरोध में कोल्हान बंद, चांडिल में हाईवे जाम कर प्रदर्शन
चांडिल, 23 फरवरी : एक ओर झारखंड में नगरपालिका चुनाव को लेकर मतदान की प्रक्रिया जारी है, वहीं दूसरी ओर पांचवीं अनुसूची क्षेत्र में नगरपालिका चुनाव कराए जाने के विरोध में आदिवासी संगठनों ने कोल्हान बंद का आह्वान किया। बंद का हल्का-फुल्का असर सरायकेला-खरसावां जिले के चांडिल क्षेत्र में देखने को मिला।


चांडिल थाना क्षेत्र के चिलगु तिलका माझी मोड़ के पास प्रदर्शनकारियों ने टाटा–रांची मुख्य मार्ग (हाइवे) को कुछ समय के लिए जाम कर दिया। अचानक हुए सड़क जाम के कारण दोनों ओर वाहनों की लंबी कतार लग गई। यात्री बसें, मालवाहक ट्रक और निजी वाहन कुछ देर तक फंसे रहे। हालांकि चांडिल पुलिस की गस्ती दल सक्रिय होने के कारण तुरंत ही जाम को हटा लिया गया और यातायात सामान्य हो गया।

प्रदर्शन कर रहे आदिवासी संगठनों के प्रतिनिधियों ने कहा कि कोल्हान क्षेत्र पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आता है, जहां पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था और आदिवासी रीति-रिवाजों को संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। उनका आरोप है कि ऐसे क्षेत्र में नगरपालिका चुनाव कराना असंवैधानिक है और यह आदिवासी स्वायत्तता एवं पारंपरिक ग्रामसभा व्यवस्था को कमजोर करने का प्रयास है।
प्रदर्शनकारियों का कहना था कि भारतीय संविधान की पांचवीं अनुसूची आदिवासी बहुल क्षेत्रों को विशेष अधिकार प्रदान करती है, जिसके तहत स्थानीय परंपराओं, सामाजिक संरचना और स्वशासन प्रणाली की रक्षा सुनिश्चित की गई है। उनका आरोप है कि राज्य सरकार इन अधिकारों की अनदेखी कर शहरी निकाय चुनाव थोप रही है, जिससे पारंपरिक व्यवस्था प्रभावित होगी।
हालांकि प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार, कानून-व्यवस्था की स्थिति पूरी तरह नियंत्रण में रही और कहीं से किसी अप्रिय घटना की सूचना नहीं है। चांडिल में बंद का असर सीमित रहा तथा बाजार और अन्य गतिविधियां सामान्य रूप से संचालित होती रहीं।

इधर, चुनाव प्रक्रिया निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार जारी है। सुरक्षा के मद्देनजर संवेदनशील क्षेत्रों में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है। प्रशासन ने लोगों से शांति बनाए रखने और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सहयोग करने की अपील की है।
नगरपालिका चुनाव और पांचवीं अनुसूची को लेकर छिड़ा यह विवाद फिलहाल राजनीतिक और सामाजिक बहस का विषय बना हुआ है। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर सरकार और आदिवासी संगठनों के बीच संवाद की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा है।


