पेसा कानून लागू होने पर भी गांवों के विकास पर उठे सवाल
चाईबासा(प्रकाश कुमार गुप्ता): गांवों के विकास और व्यवस्था सुधार को लेकर पेसा (PESA) कानून के लागू होने पर एक बार फिर सवाल खड़े किए गए हैं। सामाजिक कार्यकर्ता साधु हो’ ने कहा है कि केवल कानून लागू कर देने से गांवों की स्थिति अपने आप नहीं सुधरती। इसके लिए समाज और व्यवस्था दोनों में बदलाव जरूरी है।


उन्होंने कहा कि आदिवासियों के विकास का हवाला देकर बिहार से झारखंड को अलग किया गया था। राज्य गठन के 25 वर्ष पूरे हो चुके हैं, लेकिन आज भी यह सवाल बना हुआ है कि जमीनी स्तर पर कितना सुधार हुआ है। इसी तरह कोल्हान क्षेत्र को बड़ा बताकर उसे तीन हिस्सों में बांट दिया गया, लेकिन अब तक अपेक्षित तरक्की नजर नहीं आती।
साधु हो’ ने पंचायत व्यवस्था पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि गांवों का विकास नहीं हो रहा है, यह कहकर पंचायत चुनाव कराए गए। इसके बावजूद ग्रामीण क्षेत्रों में मूलभूत सुविधाओं और विकास में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता। उन्होंने कहा कि अब नेताओं द्वारा यह तर्क दिया जा रहा है कि सही कानून लागू नहीं होने के कारण विकास नहीं हो पा रहा था, इसलिए पेसा कानून लागू कराया गया।
उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि उन्हें नहीं लगता कि केवल पेसा कानून लागू होने से गांवों का समग्र विकास हो जाएगा। उनका मानना है कि यह सब केवल नेतागिरी है। नेता आते रहेंगे, चेहरे बदलते रहेंगे, लेकिन हालात जस के तस बने रहेंगे।
साधु हो’ ने कहा कि अगर वास्तव में व्यवस्था बदलनी है तो सबसे पहले हमें स्वयं को बदलना होगा। जब तक समाज जागरूक होकर अपनी जिम्मेदारी नहीं समझेगा, तब तक कोई भी कानून अकेले विकास नहीं कर सकता। उन्होंने ग्रामीणों से आत्ममंथन करने और संगठित होकर अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझने की अपील की।
उन्होंने अंत में कहा कि व्यवस्था में सुधार की शुरुआत जनता के सोच और व्यवहार से होती है, केवल कानून से नहीं।

