झारखंड में कस्टोडियल डेथ पर हाईकोर्ट सख्त, राज्य सरकार से मांगा जवाब

झारखंड में हिरासत में होने वाली मौतों के मामलों को लेकर झारखंड हाईकोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने इन घटनाओं को संवैधानिक व्यवस्था की गंभीर विफलता बताते हुए राज्य सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं। कोर्ट ने कहा कि किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में हिरासत में मौत बेहद गंभीर विषय है और इसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है।



हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान राज्य में वर्ष 2018 से 2026 तक हुई कस्टोडियल डेथ के आंकड़े पेश किए गए। अदालत के समक्ष रखी गई जानकारी के अनुसार कई मामलों में नियमों के अनुरूप न्यायिक जांच नहीं कराई गई। कोर्ट ने इस पर नाराजगी जताते हुए कहा कि कानून के तहत ऐसे मामलों की जांच न्यायिक मजिस्ट्रेट से कराना अनिवार्य है।
डिवीजन बेंच ने यह भी टिप्पणी की कि प्रक्रिया का सही तरीके से पालन नहीं होना चिंता का विषय है। अदालत ने कहा कि यदि किसी मामले में राज्य एजेंसियां खुद ही जांचकर्ता बन जाएं तो निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने उन मामलों में दोबारा न्यायिक जांच कराने के निर्देश दिए, जहां निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ था। साथ ही राज्य सरकार से पूछा गया कि नियमों की अनदेखी करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई।
अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 21 का उल्लेख करते हुए कहा कि जीवन और गरिमा का अधिकार हर व्यक्ति को प्राप्त है, चाहे वह हिरासत में ही क्यों न हो। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी भी परिस्थिति में मानवाधिकारों की अनदेखी स्वीकार नहीं की जा सकती।
यह मामला एक जनहित याचिका के माध्यम से हाईकोर्ट पहुंचा था। सुनवाई के दौरान अदालत ने सरकारी आंकड़ों में विसंगतियों पर भी सवाल उठाए और राज्य सरकार को भविष्य में स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने को कहा, ताकि कस्टोडियल डेथ मामलों में केवल न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा ही जांच सुनिश्चित हो सके।
हाईकोर्ट की इस टिप्पणी के बाद राज्य में पुलिस हिरासत और मानवाधिकारों को लेकर बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि अदालत की सख्ती से आने वाले समय में जवाबदेही और निगरानी व्यवस्था मजबूत हो सकती है।

