सफलता की कहानी: सीतारामपुर जलाशय में पहली बार केज पद्धति से मछली पालन, आदिवासी परिवारों को मिला नया आजीविका साधन
गम्हरिया (सरायकेला-खरसावां)।


धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान योजना के तहत सरायकेला-खरसावां जिले के गम्हरिया अंचल स्थित सीतारामपुर जलाशय में पहली बार वैज्ञानिक केज कल्चर तकनीक से मछली पालन की शुरुआत की गई है। यह पहल स्थानीय आदिवासी समुदाय को आजीविका के स्थायी और सम्मानजनक साधन से जोड़ने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
करीब 70 हेक्टेयर में फैले सीतारामपुर जलाशय का निर्माण वर्ष 1960 में शुरू हुआ था और 1963 से जल संग्रहण का कार्य प्रारंभ हुआ। जलाशय के निर्माण के चलते आसपास के लगभग 10 गांवों के 1300 से अधिक परिवारों को विस्थापित होना पड़ा था, जो मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर थे। वर्ष 2007 से इन विस्थापित परिवारों को मत्स्य पालन से जोड़ा गया, हालांकि शुरुआत में केवल पारंपरिक पद्धति से ही मछलियों का शिकार होता था

वित्तीय वर्ष 2024-25 में पहली बार केज कल्चर तकनीक के तहत आठ लाभुकों को कुल 32 केज यूनिट उपलब्ध कराए गए हैं। इस योजना के तहत प्रत्येक यूनिट के निर्माण की कुल लागत का 90 प्रतिशत हिस्सा अनुदान (60% केंद्रांश + 30% राज्यांश) के रूप में दिया गया है, जबकि 10 प्रतिशत अंशदान लाभुकों द्वारा वहन किया गया है।
इन केज यूनिट्स को जी.आई. पाइप और मजबूत जाल से वैज्ञानिक ढंग से तैयार किया गया है, ताकि मछलियों को सुरक्षित वातावरण मिल सके। प्रत्येक यूनिट में चार घेरे होते हैं, जिनका आकार 7x5x5 मीटर है। केज में अंगुलिकाएं डालने के साथ उन्हें नियमित संतुलित आहार दिया जाता है, और जल की गुणवत्ता की निगरानी भी की जाती है।
सीतारामपुर जलाशय में पूर्व से रिवराइन फिश फार्मिंग, मछली-सह बत्तख पालन, गिल नेट शिकार, परंपरागत नाव योजना जैसी गतिविधियां संचालित की जाती रही हैं। लेकिन वैज्ञानिक केज कल्चर के शुरू होने से मछली उत्पादन में 8 से 10 गुना तक की वृद्धि दर्ज की गई है।
मछली विपणन को आसान बनाने के लिए झास्कोफिश के सहयोग से समिति को कार्यालय शेड, आवश्यक उपकरण, दुपहिया व तीनपहिया वाहन तथा आइस बॉक्स जैसी सुविधाएं दी जा रही हैं, जिससे मछलियों के संग्रहण व बिक्री में सुविधा हो सके।
स्थानीय मत्स्यजीवी समितियों के अनुसार, इस पहल से न केवल मछली उत्पादन में बढ़ोत्तरी हो रही है, बल्कि आदिवासी समुदाय के जीवन स्तर में भी सकारात्मक बदलाव आया है। योजना ने उन्हें आर्थिक रूप से सशक्त और आत्मनिर्भर बनाने में मदद की है।
इस योजना का प्रभावी क्रियान्वयन यह दर्शाता है कि यदि सरकारी योजनाओं को सही दिशा में लागू किया जाए, तो वे ग्रामीण और जनजातीय समुदायों के जीवन में बड़ा बदलाव ला सकती हैं।

