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वायु प्रदूषण से जनता बेहाल, विभाग और टाटा स्टील की गठजोड़ — छिन रही है जनता की सांसें

सरायकेला:- संवाददाता

सरायकेला जिले के गम्हारिया प्रखंड में टाटा स्टील कंपनी द्वारा फैलाए जा रहे वायु प्रदूषण से स्थानीय लोग बुरी तरह परेशान हैं। क्षेत्र में फैली काली धूल ने न केवल लोगों का जीवन दूभर कर दिया है, बल्कि पेड़-पौधों और घरों पर भी प्रदूषण की मोटी परत जम गई है। हालात इतने गंभीर हैं कि लोगों को खुले में सांस लेना तक मुश्किल हो गया है।

 

स्थानीय निवासियों का कहना है कि कंपनी के कन्वेयर बेल्ट से लगातार उड़ती धूल सड़कों पर गिरती है, जिससे रोजाना हजारों राहगीर, स्कूली बच्चे और ग्रामीण प्रभावित हो रहे हैं। धूल आंखों और फेफड़ों में घुसकर लोगों को बीमार बना रही है। कई बार विरोध के बावजूद हालात जस के तस बने हुए हैं।

 

कंपनी की टैगलाइन “We Also Make Tomorrow” अब लोगों के बीच सवाल बनकर गूंज रही है — क्या टाटा स्टील ऐसा कल बनाना चाहती है, जहाँ लोगों को सांस लेना भी दूभर हो जाए?

 

गौरतलब है कि गम्हारिया स्थित टाटा स्टील का यह प्लांट पूर्व में उषा मार्टिन लिमिटेड के नाम से जाना जाता था। स्थानीय लोगों का आरोप है कि कंपनी ने वर्षों पहले एक सरकारी सड़क को अपने अधीन कर लिया था और एक दूसरा सड़क मुहैया कराया था अब उसी मार्ग का उपयोग ग्रामीणों को कठिनाई के साथ करना पड़ रहा है। 

 

 

प्रदूषण से देशभर में बढ़ रहा स्वास्थ्य संकट

 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत में वायु प्रदूषण से जुड़ी बीमारियों के कारण हर साल करीब 20 लाख लोगों की मौत होती है। स्टेट ऑफ ग्लोबल एयर 2025 रिपोर्ट के अनुसार, 2009 से 2019 के बीच देश में करीब 38 लाख लोगों की मौतें उन क्षेत्रों में दर्ज हुईं जहाँ वायु गुणवत्ता भारत के अपने मानकों से भी खराब थी।

 

दिल्ली जैसे महानगरों में भी हालात गंभीर हैं — वर्ष 2023 में अकेले राष्ट्रीय राजधानी में वायु प्रदूषण से जुड़ी करीब 17,188 मौतें दर्ज की गईं। विशेषज्ञों के अनुसार, हवा में मौजूद सूक्ष्म कण PM2.5 फेफड़ों और रक्त प्रवाह में जाकर गंभीर बीमारियाँ पैदा करते हैं, जिनमें फेफड़े का कैंसर, हृदय रोग, स्ट्रोक और अस्थमा प्रमुख हैं।

 

 

 

कानून हैं, पर अमल नहीं

 

भारत में वायु प्रदूषण को रोकने के लिए Air (Prevention and Control of Pollution) Act, 1981 लागू है।

इसके तहत प्रत्येक उद्योग को उत्सर्जन की निर्धारित सीमा का पालन करना अनिवार्य है।

केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) ने National Ambient Air Quality Standards (NAAQS) के माध्यम से औद्योगिक और आवासीय इलाकों के लिए अलग-अलग मानक तय किए हैं।

 

इसके अलावा, दिल्ली-एनसीआर जैसे क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता के गिरने पर Graded Response Action Plan (GRAP) के तहत अस्थायी प्रतिबंध भी लगाए जाते हैं।

हालांकि, गम्हारिया के मामले में सवाल यह उठता है कि जब नियम मौजूद हैं, तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही?

 

 

स्थानीय प्रशासन की चुप्पी पर उठ रहे सवाल

 

इलाके के लोगों का कहना है कि प्रशासन और प्रदूषण नियंत्रण विभाग दोनों टाटा स्टील के प्रभाव में हैं।

लोगों के बार-बार शिकायत करने के बावजूद न तो कोई निरीक्षण हुआ और न ही कंपनी के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई की गई।

 

स्थानीय निवासी बताते हैं कि सुबह-सुबह जब बच्चे स्कूल जाते हैं, तो हवा में इतनी धूल होती है कि नंगे आंखों से चलना मुश्किल होता है। कई बार धूल आंखों में जलन और सांस की तकलीफ बढ़ा देती है।

 

 

 

जनता की आवाज़ दब रही है

 

गांवों और बस्तियों में रहने वाले लोग रोजाना जहरीली हवा में सांस ले रहे हैं।

प्रशासन की चुप्पी और कंपनी के प्रभाव ने आम नागरिकों को बेबस बना दिया है।

लोग कहते हैं —

 

“हम शिकायत करते हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं होती। धूल के कारण बच्चों को खांसी, बड़ों को सांस की बीमारी हो गई है।”

 

 

निष्कर्ष

 

गम्हारिया की हवा में घुलता यह जहर सिर्फ एक कंपनी की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की असंवेदनशीलता की कहानी है।

वक़्त आ गया है कि प्रशासन कानूनों को केवल कागजों में नहीं, ज़मीन पर भी लागू करे —

क्योंकि जब हवा ही जहर बन जाए, तो इंसान का बचना मुश्किल हो जाता है।

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