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हृदय से निकलने वाली चीजें मातृभाषा में ही व्यक्त हो पाती हैं : डॉ. अशोक कुमार झा  

 

 

 

मातृभाषाओं को बचाने का मतलब है, इंसानी प्रजातियों को बचाना: डॉ. सुधीर कुमार

 

मातृभाषा दिवस पर एलबीएसएम कॉलेज में छात्राओं द्वारा कई भाषाओं में लोककथाओं और कविताओं की प्रस्तुति

 

प्रकाशनार्थ/ प्रसारणार्थ

जमशेदपुर: 21 फरवरी 2021

‘‘मातृभाषा स्रोत भाषा होती है। हृदय से निकलने वाली चीजें मातृभाषा में ही व्यक्त हो पाती हैं। मातृभाषा से जो कट जाएगा, वह अपनी जड़ों से कट जाएगा। सामाजिक-सांस्कृतिक और इंसानी मूल्यों को बचाने के लिए मातृभाषाओं और उनकी विविधता को बचाना जरूरी है। हम मातृभाषा से प्रेम के बगैैर न राष्ट्रीय हो सकते हैं और न ही अंतर्राष्ट्रीय। राष्ट्रभाषा, अंर्तराष्ट्रीय भाषा को जानना-समझना जरूरी है, पर उससे भी जरूरी है मातृभाषा में खुद को व्यक्त करना, क्योंकि वह किसी भी मनुष्य के ज्ञान और अभिव्यक्ति की शक्ति के विकास के लिए अत्यंत आवश्यक है। मातृभाषा हमें ज्ञान की समृद्ध लोकपरंपरा से जोड़ती है। वह प्रेम की भाषा होती है। बहुत पहले विद्यापति कह गए हैं- देसिल बयना सब जन मिट्ठा। वे संस्कृत के भी बड़े विद्वान थे, पर उन्होंने मातृभाषा को महत्त्व दिया और इसी ने उन्हें लोकप्रिय भी बनाया। मैथिली, उड़िया, बांग्ला भाषाओं को बोलने वाले उन्हें अपनी ही भाषा का कवि मानते हैं।’’ आज एलबीएसएम कॉलेज में हिन्दी विभाग और साहित्य कला परिषद की ओर अंतर्राष्टीय मातृभाषा दिवस पर आयोजित कार्यक्रम के मुख्य अतिथि प्राचार्य डॉ. अशोक कुमार झा ने ये विचार व्यक्त किए।

डॉ. अशोक कुमार झा ने मातृभाषा में पढ़ाई के महत्त्व की चर्चा करते हुए कहा कि पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम कहते थे कि अपनी मातृभाषा तमिल में पढ़़ाई के कारण ही यह संभव हो सका कि वे आगे चलकर एक वैज्ञानिक बन पाए। थोपी हुई कोई भाषा हमारे विकास का माध्यम नहीं बन सकती।

इस अवसर पर वाणिज्य विभाग के अध्यक्ष और बर्सर डॉ. विजय प्रकाश ने कहा कि नई शिक्षा नीति में कई मातृभाषाओं को स्थान दिया गया है और कई भाषाएं शामिल होने की कतार में हैं। मातृभाषाओं में शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ेंगे। आज संकल्प लेने का दिन हैै कि हम सब अपनी-अपनी मातृभाषा में बात करेंगे।

इस मौके पर सुमन तांती, पूजा हेम्ब्रम, नैन्सी एक्का, निकिता तिग्गा, निर्जला पुराण ने उड़िया, संताली, कुड़ुख, बांग्ला, मैथिली आदि भाषाओं की लोककथाओं और कविताओं को सुनाया। इनमें सुमन तांती की उड़िया कहानी की प्रस्तुति बहुत ही प्रभावशाली थी। डॉ. विजय प्रकाश ने खोरठा भाषा में रचित गीत ‘धरती मन रउरे कितना महान’ सुनाया। डॉ. सुधीर कुमार ने रघुवीर नारायण के सुप्रसिद्ध गीत ‘बटोहिया’ के अंशों को गाकर सुनाया।

संचालन करते हुए हिन्दी विभाग के सहायक आचार्य डॉ. सुधीर कुमार ने कहा कि इस बार अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस का थीम बहुभाषी शिक्षा को आकार देने में युवाओं की भूमिका विषय पर केंद्रित है, उसी के अनुरूप आज छात्रों और शिक्षकों ने अपनी मातृभाषा में रचनाओं को सुनाया। यह बहुभाषी शिक्षा के महत्त्व और भविष्य की संभावनाओं को चिह्नित करने की दृष्टि से एक छोटा प्रयास कहा जा सकता है। उन्होंने कहा कि बहुत सारी मातृभाषाएं तेजी से खत्म हो रही हैं। शिक्षा, प्रशासन और डिजिटल दुनिया में कुछ भाषाओं का ही दबदबा है। रोजगार की तलाश में भी युवा अपनी मातृभाषाओं से कट रहे हैं, जो चिंताजनक है। उन्होंने कहा कि मातृभाषाओं को बचाने का मतलब है, इंसानी प्रजातियों और उनकी विपुल सामाजिक-सांस्कृतिक विविधता को बचाना। पूरी इंसानियत को बचाना। मातृभाषाओं की विविधता की दृष्टि से झारखंड बहुत समृद्ध है। अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस को इस विविधता को बचाने और इन मातृभाषाओं को बोलने वाले युवाओं को उसी भाषा में शिक्षा और रोजगार प्रदान करने के संकल्प का दिन बनाना चाहिए।

कार्यक्रम में अर्चना बारला, खुशी महतो, इशा पात्रो, प्रियंका कुमारी सिंह, शिबम सरदार, वंदिनी झा, फिर्दा हस्सा पुर्ति समेत विभिन्न सेमेस्टरों के दर्जनों छात्र-छात्राएं मौजूद थे।

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