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एल. एम. नारायण पब्लिक स्कूल में धूमधाम से मना दिवाली और सोहराय पर्व, पारंपरिक रीति-रिवाजों से बच्चों को कराया गया परिचित

 

 

राजनगर। सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत बांकासाई स्थित एल. एम. नारायण पब्लिक स्कूल में दिवाली और पारंपरिक सोहराय (बांदना) पर्व हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर विद्यालय परिसर में सांस्कृतिक कार्यक्रमों, प्रतियोगिताओं और पारंपरिक रीति-रिवाजों की आकर्षक झलक देखने को मिली। कार्यक्रम के माध्यम से विद्यार्थियों को दिवाली के साथ-साथ झारखंड की समृद्ध लोक संस्कृति और परंपराओं से भी रूबरू कराया गया।

 

कार्यक्रम की शुरुआत विद्यालय के प्राचार्य एवं निदेशक कंपाउंडर महतो ने की। उन्होंने बच्चों को दिवाली और सोहराय पर्व के महत्व, इसकी परंपराओं तथा इसे मनाने के पीछे की मान्यताओं के बारे में विस्तार से जानकारी दी। उन्होंने कहा कि नई पीढ़ी को अपनी पारंपरिक संस्कृति और त्योहारों से जोड़ना बेहद जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां अपनी विरासत को समझें और उसे आगे बढ़ाएं।

 

इसके बाद विद्यालय में सोहराय पेंटिंग और सोहराय गीत प्रतियोगिता का आयोजन किया गया, जिसमें विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। बच्चों ने अपनी कला और प्रतिभा के माध्यम से झारखंड की पारंपरिक संस्कृति को खूबसूरती से प्रस्तुत किया। वहीं, छोटे-छोटे बच्चों ने दीये और फुलझड़ियां जलाकर दिवाली की खुशियां मनाईं।

 

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण पारंपरिक सोहराय यानी बांदना पर्व का आयोजन रहा। इस दौरान पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार बैलों का स्वागत किया गया। बैलों को विद्यालय के मुख्य द्वार से पारंपरिक तरीके से अंदर लाया गया। इसके बाद उन्हें खूंटे से बांधकर उनके सींगों में तेल लगाया गया, पैरों को धुलाया गया और माथे पर तिलक लगाकर मुकुट पहनाया गया। विधि-विधान से आरती उतारने के बाद बैलों को पारंपरिक अंदाज में नचाया गया। इस अनूठे आयोजन को देखकर बच्चे काफी उत्साहित नजर आए और उन्होंने इस परंपरा के बारे में कई जानकारियां भी हासिल कीं।

 

विद्यालय प्रबंधन की ओर से बताया गया कि सोहराय और बांदना पर्व झारखंड की ग्रामीण एवं आदिवासी संस्कृति का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। कृषि कार्य में सालभर किसानों का साथ देने वाले पशुधन के प्रति सम्मान और आभार प्रकट करने के उद्देश्य से यह पर्व मनाया जाता है। इस दौरान बैलों को सजाया जाता है, उनके सींगों में तेल लगाया जाता है तथा धान की बालियों और पारंपरिक घास से तैयार सामग्री के माध्यम से उनका श्रृंगार किया जाता है। पशुओं की पूजा-अर्चना कर उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है।

 

प्राचार्य एवं निदेशक कंपाउंडर महतो ने कहा कि आज की नई पीढ़ी दिवाली जैसे त्योहारों से तो परिचित है, लेकिन अपनी पारंपरिक संस्कृति और सोहराय-बांदना जैसे पर्वों की जानकारी धीरे-धीरे कम होती जा रही है। इसी उद्देश्य से विद्यालय में इस तरह का आयोजन किया गया, ताकि बच्चे अपनी सांस्कृतिक विरासत को करीब से समझ सकें और भविष्य में इन परंपराओं को जीवित रख सकें।

 

कार्यक्रम के अंत में सभी ने एक-दूसरे को गले लगाकर दिवाली और बांदना पर्व की शुभकामनाएं दीं। पूरे आयोजन के दौरान विद्यालय परिसर में उत्साह, उमंग और पारंपरिक संस्कृति का सुंदर संगम देखने को मिला।

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