*पेसा अधिनियम के तहत कुड़मी समुदाय की अनदेखी: एक बड़ा सवाल*
झारखंड में कुड़मी समुदाय की जनसंख्या 24% होने के बावजूद, पेसा अधिनियम के तहत उन्हें शासन व्यवस्था से दूर रखा जा रहा है। यह अधिनियम 1996 में देश के अनुसूचित जनजाति के बहुलता क्षेत्रों में स्वशासन सुनिश्चित करने के लिए लाया गया था। इस अधिनियम के तहत ग्राम सभा को महत्वपूर्ण अधिकार दिए गए हैं, जैसे कि विकास योजना और सामाजिक क्षेत्रों को नियंत्रित करना।


कुड़मी समुदाय के लोग सवाल उठा रहे हैं कि जब उनकी जनसंख्या झारखंड में इतनी अधिक है, तो उन्हें पेसा कानून के तहत शासन व्यवस्था में शामिल क्यों नहीं किया जा रहा है। क्या वे सिर्फ वोटर बैंक बनकर रह जाएंगे? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि झारखंड राज्य अलग करने के लिए हमारे पूर्वजों ने अपना बलिदान दिया था।
झारखंड में 35 जातियों को मिलाकर अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या 23% है, लेकिन कुड़मी समुदाय की जनसंख्या अकेले ही 24% है। इसके बावजूद, कुड़मी समुदाय को पेसा अधिनियम के तहत शासन व्यवस्था में शामिल नहीं किया जा रहा है। यह एक बड़ा सवाल है जिसका जवाब झारखंड सरकार को देना होगा।
कुड़मी समुदाय के लोग मांग कर रहे हैं कि उन्हें पेसा अधिनियम के तहत शासन व्यवस्था में शामिल किया जाए और उनके अधिकारों को सुनिश्चित किया जाए। देखना होगा कि झारखंड सरकार इस मामले में क्या कदम उठाती है और कुड़मी समुदाय के लोगों को उनका हक दिलाने के लिए क्या किया जाएगा।
झारखंड की राजनीति में कुड़मी समुदाय की भूमिका महत्वपूर्ण है, और उन्हें अपने अधिकारों के लिए लड़ना होगा। यह देखना होगा कि झारखंड सरकार कुड़मी समुदाय की मांगों को सुनती है और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करती है या नहीं।

