शिक्षकों का हंगामा या सच्चाई से बचने की कोशिश? DC ऑफिस से थाना तक बवाल, पत्रकार पर FIR की मांग

सरायकेला में आज शिक्षा विभाग से जुड़े लगभग 40 से 50 शिक्षकों ने डीसी कार्यालय और सरायकेला थाना परिसर में जमकर हंगामा किया। मामला एक ऐसी खबर से जुड़ा है, जिसमें आरोप लगाया गया था कि शिक्षक कामिनी कांत मेहता और विमल डोगरा अपने विद्यालय में कम और प्रखंड कार्यालय में अधिक सक्रिय रहते हैं। खबर में यह भी सवाल उठाया गया था कि आखिर किसकी “ऊपर तक सेटिंग” है, जिसकी वजह से इन पर कार्रवाई नहीं होती।


लेकिन इस खबर के सामने आने के बाद जिस तरह से शिक्षकों का समूह सड़क पर उतर आया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। अगर खबर गलत थी, तो विभागीय जांच की मांग की जाती, तथ्यों के साथ जवाब दिया जाता और दोषी पाए जाने पर कार्रवाई की बात कही जाती। मगर ऐसा करने के बजाय शिक्षकों ने एकजुटता और संगठन की ताकत दिखाते हुए पत्रकार पर FIR दर्ज कराने का रास्ता चुना।
यह वही शिक्षक वर्ग है जिसे समाज में सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, जिनके हाथों में बच्चों का भविष्य होता है और जिन्हें सरकार भी अच्छी-खासी तनख्वाह देती है। लेकिन जब शिक्षक बच्चों को पढ़ाने से ज्यादा विभागीय राजनीति और प्रभाव दिखाने में व्यस्त दिखें, तो सवाल उठना लाज़िमी है।
आज का प्रदर्शन इसी मानसिकता की झलक देता है—जहां आरोपों का जवाब देने या जांच का सामना करने के बजाय दबाव बनाकर आवाज दबाने की कोशिश की गई। पहले सरायकेला थाना में आवेदन दिया गया, फिर शिक्षक DPRO कार्यालय पहुंचे, लेकिन जब मीडिया ने सवाल पूछने चाहे, तो कुछ भी बोलने से साफ इंकार कर दिया गया।
अब सवाल यह है कि अगर आरोप बेबुनियाद हैं तो खुलकर सामने आने में डर कैसा?
अगर सब कुछ साफ है तो जांच से परहेज क्यों?
और अगर शिक्षक ही सवालों से भागने लगें, तो फिर पारदर्शिता की उम्मीद किससे की जाए?
यह मामला केवल दो शिक्षकों या एक खबर का नहीं है, बल्कि यह उस मानसिकता का आईना है जिसमें सवाल उठाने वाले को ही कटघरे में खड़ा करने की कोशिश होती है।
अब देखना यह है कि प्रशासन इस पूरे मामले में निष्पक्ष जांच करता है या फिर यह मामला भी “ऊपर तक सेटिंग” के आरोपों में दबकर रह जाएगा।

