LatestNewsNews postझारखण्डसरायकेला

आदिवासी अधिकारों और अस्तित्व की रक्षा के लिए एकजुट होने का आह्वान, चंपाई सोरेन ने कहा—संघर्ष ही रास्ता

सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर में विश्व आदिवासी दिवस के अवसर पर रविवार को आदिवासी समाज का बड़ा जुटान हुआ। फुटबॉल मैदान में आदिवासी संवाता सुशार आखड़ा के बैनर तले आयोजित कार्यक्रम में समाज की वर्तमान स्थिति, आदिवासी पहचान, जल-जंगल-जमीन, भाषा, संस्कृति, परंपरा और धार्मिक अधिकारों को लेकर परिचर्चा हुई।

 

कार्यक्रम में पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन, जिला परिषद अध्यक्ष सोनाराम बोदरा सहित विभिन्न क्षेत्रों से पहुंचे मांकी-मुंडा, माझी-परगना और माझी बाबा व्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधियों ने अपने विचार रखे।

 

अपने संबोधन में चंपाई सोरेन ने कहा कि आदिवासी समाज का इतिहास संघर्षों से भरा रहा है। बिरसा मुंडा, सिदो-कान्हू, चांद-भैरव और तिलका मांझी जैसे वीरों ने समाज की पहचान, अधिकार और परंपराओं की रक्षा के लिए लड़ाई लड़ी। उन्होंने कहा कि आज भी आदिवासी समाज के सामने अपनी जमीन, प्राकृतिक संसाधनों, भाषा और संस्कृति को बचाने की चुनौती है।

 

पेसा कानून का जिक्र करते हुए चंपाई सोरेन ने कहा कि ग्रामसभा को मजबूत किए बिना आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा संभव नहीं है। उन्होंने आरोप लगाया कि मौजूदा व्यवस्था में ग्रामसभा की शक्तियों को सीमित किया जा रहा है और अधिकारियों की भूमिका बढ़ाई जा रही है। उन्होंने अपने मुख्यमंत्री कार्यकाल का उल्लेख करते हुए कहा कि उस दौरान ग्रामसभा को अधिक अधिकार देने और उसकी सहमति को प्राथमिकता देने का प्रयास किया गया था।

 

उन्होंने कहा कि कोल्हान के आदिवासियों ने इतिहास में बाहरी ताकतों के सामने कभी आसानी से हार नहीं मानी। लेकिन आज जमीन और अधिकारों से जुड़े कई मामले समाज के लिए चिंता का विषय हैं। उन्होंने नगड़ी सहित विभिन्न जमीन विवादों का उदाहरण देते हुए सरकार पर आदिवासियों के हितों की अनदेखी करने का आरोप लगाया।

 

चंपाई सोरेन ने समाज के पारंपरिक नेतृत्व से अपील की कि मांकी-मुंडा और माझी-परगना व्यवस्था से जुड़े लोग समाज के भविष्य को लेकर गंभीरता से विचार करें। उन्होंने कहा कि अगर आदिवासी समाज अपनी भाषा, संस्कृति, परंपरा और धार्मिक स्थलों की रक्षा के लिए अभी संगठित नहीं हुआ तो आने वाली पीढ़ियों के सामने अपनी पहचान को बचाए रखना चुनौती बन सकता है।

 

उन्होंने धर्मांतरण के मुद्दे पर भी समाज के लोगों को जागरूक होने की अपील की। साथ ही आरोप लगाया कि समाज के कुछ लोग ही आदिवासियों की जमीन के कारोबार में शामिल हो रहे हैं। उन्होंने लोगों से अपने संवैधानिक और पारंपरिक अधिकारों के लिए संगठित होकर आवाज उठाने की अपील की।

 

चंपाई सोरेन ने अपने पुराने आंदोलनों का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने यूसीएल और टाटा जैसी कंपनियों के खिलाफ भी लोगों के अधिकारों को लेकर संघर्ष किया है। उन्होंने कहा कि भाजपा में शामिल होने के पीछे आदिवासी अस्तित्व, जल-जंगल-जमीन, धर्म और आरक्षण जैसे मुद्दों को प्रमुखता से उठाना उनका उद्देश्य है।

 

इसी दौरान उन्होंने घोषणा की कि आने वाले समय में चाईबासा में करीब पांच लाख आदिवासियों का बड़ा महाजुटान किया जाएगा। उन्होंने कहा कि उस कार्यक्रम में आदिवासी हितों के खिलाफ किए गए पेसा कानून के संशोधन का विरोध करते हुए इसकी प्रति फाड़कर अपना विरोध दर्ज कराएंगे। उनका कहना था कि ऐसा कोई भी कानून स्वीकार नहीं किया जा सकता, जिससे आदिवासियों की जमीन और अधिकारों की सुरक्षा कमजोर हो।

 

कार्यक्रम में संथाल, हो और भूमिज समाज के कलाकारों के साथ आदिवासी फिल्म जगत से जुड़े कलाकारों ने पारंपरिक नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं। इस दौरान शिक्षक बलराम टुडू द्वारा तैयार की गई चंपाई सोरेन की टाइगर के साथ बनाई गई पेंटिंग उन्हें भेंट की गई।

 

कार्यक्रम को सफल बनाने में बाबूलाल सोरेन, सिमल सोरेन, बबलू सोरेन, मालती देवगम, सुलेखा हांसदा, डोबरो देवगम, सावन सोय, सुराय मुर्मू, समुराम टुडू, जयराम मुर्मू, अमन हांसदा, राजो टुडू, मार्शल पुरती, सगेन टुडू सहित कई लोगों की भूमिका रही।

Share this news