पुरुलिया के करम महोत्सव में जयराम महतो को मंच मिलेगा या नहीं? कुड़मी राजनीति में क्यों उठ रहा बड़ा सवाल?

पुरुलिया के कोड़ाडीह मैदान में 20 सितंबर को होने वाला आदिवासी कुड़मी समाज का करम महोत्सव अब सिर्फ एक सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं रह गया है।


इस महाजुटान पर झारखंड से लेकर पश्चिम बंगाल तक की राजनीति की नजर है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि—
क्या इस मंच पर झारखंड के चर्चित कुड़मी नेता और JLKM के प्रमुख जयराम महतो दिखाई देंगे?
क्योंकि एक तरफ इस कार्यक्रम की अगुवाई आदिवासी कुड़मी समाज के मूलखुंटा, मूल मानता अजीत प्रसाद महतो कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ कार्यक्रम में पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होने जा रहे हैं। असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्व सरमा और ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी को भी आमंत्रित किए जाने की बात सामने आई है।
बताया जा रहा है कि कार्यक्रम में बड़ी संख्या में कुड़मी समाज के लोग अलग-अलग राज्यों से पहुंचेंगे। करीब 400 नृत्य दलों के शामिल होने और एक लाख से अधिक लोगों के जुटने का दावा भी आयोजकों की ओर से किया गया है।
लेकिन जैसे-जैसे कार्यक्रम की तारीख नजदीक आ रही है, एक राजनीतिक सवाल लगातार चर्चा में है—
अगर यह पूरी तरह सामाजिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम है, अगर इसका मकसद कुड़मी समाज की एकजुटता और अधिकारों की आवाज को मजबूत करना है, तो फिर झारखंड में कुड़मी युवाओं के बीच प्रभाव रखने वाले जयराम महतो की इस मंच पर क्या भूमिका होगी?
क्या जयराम महतो को मंच दिया जाएगा?
क्या उन्हें आमंत्रित किया गया है?
या फिर यह मंच झारखंड की मौजूदा कुड़मी राजनीति के कुछ चेहरों से अलग रखा जाएगा?
इन सवालों का जवाब फिलहाल पूरी तरह साफ नहीं है।
जयराम महतो लगातार कुड़मी समाज से जुड़े मुद्दों को अपनी राजनीति के केंद्र में रखते रहे हैं। 2024 के झारखंड विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी JLKM ने अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराई और जयराम महतो खुद डुमरी से विधायक चुने गए।
दूसरी तरफ झारखंड की कुड़मी राजनीति में एक और बड़ा नाम है—आजसू प्रमुख सुदेश महतो।
सुदेश महतो लंबे समय से झारखंड की राजनीति में सक्रिय हैं और आजसू पार्टी NDA के साथ चुनावी राजनीति करती रही है।
यानी झारखंड की कुड़मी राजनीति में एक तरफ पुराना और स्थापित राजनीतिक चेहरा सुदेश महतो हैं, तो दूसरी तरफ नई राजनीतिक ताकत के रूप में जयराम महतो का नाम सामने आया है।
और अब नजर पुरुलिया के कोड़ाडीह मैदान पर है।
क्योंकि यह कार्यक्रम ऐसे समय हो रहा है जब कुड़मी समाज के सामाजिक अधिकारों, पहचान और विभिन्न मांगों को लेकर राजनीतिक चर्चा तेज है।
कार्यक्रम के आयोजकों की ओर से इसे सामाजिक एकजुटता और कुड़मी संस्कृति से जोड़कर बताया जा रहा है। वहीं कुछ रिपोर्टों में इस आयोजन को कुड़मी समाज की सामाजिक मांगों को सरकार के सामने रखने के मंच के तौर पर भी बताया गया है।
यही वजह है कि सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि मंच पर कौन आएगा।
सवाल यह भी है कि—
कुड़मी समाज की राजनीति का अगला संदेश क्या होगा?
क्या यह मंच सिर्फ संस्कृति और समाज का मंच रहेगा?
या फिर यहां से झारखंड और बंगाल की कुड़मी राजनीति को लेकर कोई बड़ा राजनीतिक संकेत भी निकल सकता है?
इसी बीच आजसू प्रमुख सुदेश महतो की केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से हालिया मुलाकात भी राजनीतिक चर्चा का विषय बनी हुई है। लेकिन इस मुलाकात के आधार पर भविष्य के किसी गठबंधन या राजनीतिक समझौते की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है।
दूसरी तरफ जयराम महतो की राजनीति को भी नजरअंदाज करना आसान नहीं है।
यही कारण है कि अब सबकी नजरें 20 सितंबर को कोड़ाडीह मैदान में होने वाले इस महाजुटान पर टिकी हैं।
क्या जयराम महतो वहां पहुंचेंगे?
अगर पहुंचेंगे तो क्या उन्हें मंच मिलेगा?
क्या सुदेश महतो और जयराम महतो एक ही मंच पर दिखाई देंगे?
और सबसे बड़ा सवाल—
क्या पुरुलिया का यह करम महोत्सव कुड़मी समाज की सामाजिक एकजुटता का संदेश देगा, या झारखंड की कुड़मी राजनीति में किसी नए समीकरण की शुरुआत का संकेत भी देगा?
इन सवालों का जवाब 20 सितंबर को कोड़ाडीह के मैदान में काफी हद तक साफ हो सकता है।
फिलहाल राजनीतिक गलियारों से लेकर कुड़मी समाज के बीच तक चर्चा एक ही है—
कोड़ाडीह के मंच पर कौन आएगा… और किसे मंच मिलेगा?


