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60 किलोमीटर साइकिल चलाकर रचा इतिहास, अब पुर्तगाल में भारत का तिरंगा लहराने को तैयार शोभा महतो, आर्थिक मदद का इंतजार

 

 

राजनगर/सरायकेला-खरसावां। सपने बड़े हों तो रास्ते की मुश्किलें भी छोटी पड़ जाती हैं। सरायकेला-खरसावां जिले के राजनगर प्रखंड अंतर्गत सोसोमोली गांव की 27 वर्षीय खिलाड़ी शोभा महतो ने अपनी मेहनत और जुनून के दम पर यह साबित कर दिखाया है। किसान परिवार से आने वाली शोभा सीमित संसाधनों के बावजूद राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना चुकी हैं। अब उन्हें पुर्तगाल में आयोजित होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है।

 

हालांकि, अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने के इस सफर में एक बार फिर आर्थिक परेशानी उनके सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। प्रतियोगिता में शामिल होने और आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने के लिए शोभा को करीब 3.20 लाख रुपये की जरूरत है। वहीं रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि 15 सितंबर निर्धारित है।

 

मॉडर्न पेंटाथलॉन की लेजर रन स्पर्धा में शोभा का चयन पुर्तगाल में 26 अक्टूबर से होने वाली वर्ल्ड चैंपियनशिप के लिए हुआ है। परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है कि वह इतनी बड़ी राशि आसानी से जुटा सके। शोभा के पिता निशापति महतो खेती-बाड़ी और मजदूरी कर परिवार का पालन-पोषण करते हैं।

 

साइकिल बनी संघर्ष की साथी

 

शोभा की उपलब्धियों के पीछे उनकी कड़ी मेहनत और संघर्ष की लंबी कहानी है। बेहतर प्रशिक्षण सुविधाओं और महंगे संसाधनों के अभाव के बावजूद उन्होंने अपने लक्ष्य से समझौता नहीं किया। प्रशिक्षण के लिए वह राजनगर से जमशेदपुर तक साइकिल से सफर करती थीं और रोजाना करीब 60 किलोमीटर तक साइकिल चलाती थीं।

 

जिस साइकिल से आमतौर पर लोग केवल आने-जाने का काम करते हैं, वही शोभा के लिए उनके सपनों तक पहुंचने का जरिया बन गई। लगातार मेहनत और अभ्यास के दम पर उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी प्रतिभा साबित की और अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने की तैयारी में हैं।

 

नेशनल में सिल्वर मेडल, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान

 

शोभा महतो ने उत्तराखंड में आयोजित नेशनल चैंपियनशिप में सिल्वर मेडल हासिल किया है। इसके अलावा वह दक्षिण अफ्रीका में आयोजित वर्ल्ड चैंपियनशिप में भी भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।

 

शोभा की उपलब्धियों का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि सरायकेला-खरसावां जिले से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘खेलो इंडिया संवाद’ कार्यक्रम में शामिल होने वाले पांच खिलाड़ियों की सूची में भी उनका नाम प्रकाशित हो चुका है।

 

गांव की मिट्टी से निकलकर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंची शोभा ने यह साबित किया है कि प्रतिभा संसाधनों की मोहताज नहीं होती। जरूरत होती है तो सिर्फ उसे सही अवसर और सहयोग देने की।

 

2024 में भी आर्थिक संकट बना था बाधा

 

शोभा के सामने आर्थिक समस्या पहली बार नहीं आई है। वर्ष 2024 में चीन में आयोजित वर्ल्ड कप के लिए भी उनका चयन हुआ था, लेकिन आर्थिक परेशानी के कारण वह उस प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं ले सकीं।

 

अब एक बार फिर उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर मिला है। इस बार मंजिल पुर्तगाल है। लेकिन यदि समय रहते आर्थिक मदद नहीं मिली तो वर्षों की मेहनत के बाद मिला यह मौका भी उनके हाथ से निकल सकता है।

 

शोभा बोलीं- मदद मिली तो भारत के लिए जरूर खेलूंगी

 

शोभा महतो ने कहा कि उन्होंने इस मुकाम तक पहुंचने के लिए काफी संघर्ष किया है। चीन में आर्थिक समस्या के कारण वह वर्ल्ड कप में हिस्सा नहीं ले पाई थीं और अब पुर्तगाल का अवसर किसी भी कीमत पर गंवाना नहीं चाहतीं।

 

उन्होंने कहा, “मैंने बहुत मेहनत करके यहां तक पहुंची हूं। पहले भी आर्थिक समस्या के कारण चीन के वर्ल्ड कप में हिस्सा नहीं ले पाई थी। अब पुर्तगाल में वर्ल्ड चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करने का मौका मिला है। घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। 15 सितंबर तक रजिस्ट्रेशन कराना है। अगर समय पर मदद मिल जाए तो मैं अपने देश के लिए खेलने पुर्तगाल जरूर जाना चाहती हूं।”

 

अब समाज के सहयोग की उम्मीद

 

शोभा की कहानी केवल एक खिलाड़ी की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन प्रतिभाओं की कहानी है जो सीमित संसाधनों के बावजूद बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का साहस रखती हैं।

 

जिस बेटी ने अपने सपने को पूरा करने के लिए रोजाना 60 किलोमीटर तक साइकिल चलाई, आज उसी बेटी को अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचने के लिए आर्थिक सहयोग की जरूरत है।

 

जनप्रतिनिधियों, प्रशासन, उद्योग जगत, सामाजिक संगठनों, खेल संघों, व्यवसायियों और खेलप्रेमियों से अपील है कि वे शोभा महतो की मदद के लिए आगे आएं, ताकि आर्थिक मजबूरी उनके सपनों के रास्ते में बाधा न बने।

 

राजनगर की इस बेटी के पास प्रतिभा है, मेहनत है और देश के लिए कुछ कर गुजरने का जज्बा भी। अब जरूरत है उसे उड़ान देने वाले हाथों की।

 

शोभा का सपना साफ है—पुर्तगाल की धरती पर भारत का तिरंगा लेकर उतरना और देश का नाम रोशन करना।

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