जमशेदपुर: सदर अस्पताल में ‘इनपेशेंट ग्लाइसेमिक कंट्रोल’ पर कार्यशाला, भर्ती मरीजों के ब्लड शुगर प्रबंधन पर विशेषज्ञों ने दिए अहम सुझाव

जमशेदपुर: पूर्वी सिंहभूम के सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल के निर्देशानुसार सिविल सर्जन कार्यालय स्थित डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम सभागार में “इनपेशेंट ग्लाइसेमिक कंट्रोल” विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। कार्यशाला की अध्यक्षता सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल ने की, जिसमें अस्पताल में भर्ती मरीजों के ब्लड शुगर प्रबंधन और बेहतर उपचार पद्धतियों पर विस्तार से चर्चा की गई।


कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सिविल सर्जन डॉ. साहिर पाल ने कहा कि इनपेशेंट ग्लाइसेमिक कंट्रोल का उद्देश्य अस्पताल में भर्ती मरीजों के ब्लड शुगर को सुरक्षित और स्थिर स्तर पर बनाए रखना है। उन्होंने कहा कि स्वास्थ्य सेवाओं का लक्ष्य केवल उपचार तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि आमजनों में भरोसा कायम करना और स्वास्थ्य सेवाओं तक सहज पहुंच सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उन्होंने उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करते हुए सेवाओं को अधिक उत्तरदायी, पारदर्शी और जनोन्मुख बनाने पर जोर दिया।
सदर अस्पताल के डायबिटोलॉजिस्ट डॉ. राम कुमार ने बताया कि इनपेशेंट ग्लाइसेमिक कंट्रोल का मुख्य उद्देश्य संक्रमण की रोकथाम, अंगों की सुरक्षा और मरीजों के शीघ्र स्वास्थ्य लाभ को सुनिश्चित करना है। उन्होंने कहा कि बेहतर ग्लाइसेमिक नियंत्रण के लिए रक्त शर्करा स्तर का नियमित प्रबंधन, हाइपोग्लाइसीमिया के जोखिम को कम करना और ग्लूकोज के स्तर में होने वाले उतार-चढ़ाव को नियंत्रित करना आवश्यक है।
उन्होंने संतुलित आहार पर जोर देते हुए कहा कि भोजन में भरपूर मात्रा में सब्जियां, फल, साबुत अनाज, दालें, मेवे तथा कम वसा वाले प्रोटीन स्रोत जैसे मछली एवं समुद्री भोजन शामिल करना चाहिए। साथ ही पर्याप्त मात्रा में पानी पीना भी स्वस्थ रक्त शर्करा स्तर बनाए रखने में सहायक होता है।
कार्यशाला में डॉ. राम कुमार ने बेसल-बोलस रेजिमेन की जानकारी देते हुए बताया कि गैर-गंभीर मरीजों के लिए लंबे समय तक प्रभावी रहने वाली बेसल इंसुलिन और भोजन के समय दी जाने वाली बोलस इंसुलिन का संयोजन अधिक प्रभावी माना जाता है। उन्होंने केवल स्लाइडिंग स्केल इंसुलिन पर निर्भर रहने से बचने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि इंसुलिन ले रहे मरीजों को दिन में कम से कम तीन बार सेल्फ मॉनिटरिंग ऑफ ब्लड ग्लूकोज करनी चाहिए तथा प्रत्येक तीन महीने में एचबीए1सी की जांच करानी चाहिए। हाइपोग्लाइसीमिया के जोखिम को कम करने के लिए आवश्यकता अनुसार इंसुलिन ड्रिप का भी उपयोग किया जाता है।
कार्यक्रम के अंत में जिला आरसीएच पदाधिकारी सह उपाधीक्षक सदर अस्पताल डॉ. रंजीत कुमार पांडा ने डायबिटोलॉजिस्ट डॉ. राम कुमार का आभार व्यक्त करते हुए कार्यशाला का समापन किया।
इस अवसर पर एसीएमओ डॉ. अजय सिन्हा, डीएलओ सह डीएमओ डॉ. मृत्युंजय धावड़िया, डीटीओ डॉ. जोगेश्वर प्रसाद, डॉ. कमलेश कुमार प्रसाद, डॉ. बिमलेश कुमार, डॉ. गंधर्व नारायण सिंह, डॉ. तापस कुमार मुर्मू, जिला कुष्ठ परामर्शी डॉ. राजीव लोचन महतो सहित सदर अस्पताल के चिकित्सक, स्त्री रोग विशेषज्ञ, अस्पताल प्रबंधक, एएनएम, पीएचएम प्रदीप कुमार एवं सुमन मंडल सहित अन्य स्वास्थ्यकर्मी उपस्थित रहे।

