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सरायकेला में CM स्कूल ऑफ एक्सीलेंस पर सवाल, रिजल्ट विवाद में DEO पर उठे आरोप

“सरायकेला की शिक्षा व्यवस्था इन दिनों सवालों के घेरे में है। सवाल इतने गंभीर हैं कि चर्चा मुख्यमंत्री तक पहुँच चुकी है। ज़िला शिक्षा अधीक्षक कैलाश मिश्रा के खिलाफ शिकायतों का एक पुलिंदा ऊपर तक भेजा गया है, जिसमें गहन जांच की मांग की गई है। आरोप छोटे-मोटे नहीं हैं—स्कूल विजिट में लापरवाही, प्राइवेट स्कूलों को कथित तौर पर पैसों के बदले लाइसेंस, सरकारी खरीद में हेराफेरी और शिक्षा विभाग में बढ़ती कमीशनखोरी। यानी शिक्षा के मंदिर में अब पढ़ाई से ज्यादा ‘सेटिंग’ की चर्चा है।

सूत्र बताते हैं कि स्कूलों में शिक्षा सुधार जमीन पर कम, फाइलों में ज्यादा दिखता है। बच्चों की पढ़ाई, शिक्षकों की समस्याएँ और स्कूलों की जरूरतें पीछे छूटती जा रही हैं, जबकि आरोप है कि फाइलों और खरीद प्रक्रियाओं में ‘खेल’ जारी है। अगर ये आरोप सही हैं, तो यह सिर्फ भ्रष्टाचार नहीं बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है।

सबसे बड़ा सवाल रिजल्ट को लेकर खड़ा हो रहा है। मुख्यमंत्री को भेजी गई शिकायत में दावा किया गया है कि जिले के CM School of Excellence का इस बार दसवीं का रिजल्ट महज़ 32 प्रतिशत रहा। यानी 100 में 68 बच्चे फेल। अगर यह सच है तो यह किसी एक स्कूल की नाकामी नहीं, बल्कि उस पूरे सिस्टम की पोल है जिसे सरकार शिक्षा सुधार का मॉडल बताती है। जिस CM School of Excellence को सरकारी शिक्षा का चेहरा बनाया गया, अगर वहीं ऐसा हाल है तो बाकी स्कूलों की हालत क्या होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

लेकिन यहाँ एक और चौंकाने वाली बात सामने आती है—इस रिजल्ट की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो पा रही है। स्कूल की वेबसाइट पर परिणाम की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है। दिए गए संपर्क नंबर पर भी कोई जवाब नहीं मिल रहा। यानी जिस स्कूल को ‘Excellence’ का तमगा दिया गया है, उसके परिणाम तक पारदर्शी तरीके से सार्वजनिक नहीं हैं। सवाल उठता है—अगर सब कुछ सही है तो आंकड़े छिप क्यों रहे हैं? और अगर गड़बड़ी है तो उसे उजागर होने से बचाया क्यों जा रहा है?

यही पारदर्शिता की कमी पूरे मामले को और गंभीर बना देती है। एक ओर सरकारी दावे हैं कि शिक्षा व्यवस्था सुधर रही है, दूसरी ओर शिकायतों में 32 प्रतिशत रिजल्ट की बात सामने आती है। सच क्या है, यह शिक्षा विभाग के पास होना चाहिए, लेकिन विभाग की चुप्पी शक को और गहरा कर रही है। जब मॉडल स्कूल का रिजल्ट तक स्पष्ट नहीं है, तो बाकी स्कूलों की वास्तविक स्थिति का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं।

सूत्रों के मुताबिक शिक्षा विभाग में कमीशनखोरी का ऐसा माहौल बन गया है कि छोटे-छोटे कामों के लिए भी शिक्षकों से पैसे की मांग की जाती है। अगर शिक्षक फाइल चलाने के लिए दौड़ेंगे, तो बच्चों की पढ़ाई कौन संभालेगा? शिक्षा विभाग अगर पढ़ाई से ज्यादा सेटिंग में व्यस्त रहेगा, तो रिजल्ट का गिरना तय है। फिर चाहे सरकारी रिपोर्ट कुछ भी कहती रहे।

सरकारी योजनाओं के नाम बड़े हैं—CM School of Excellence, गुणवत्ता सुधार, आधुनिक शिक्षा—लेकिन जमीनी सच्चाई क्या है? अगर शिकायतों में दम है तो यह साफ है कि चमकदार नामों के पीछे बदहाल व्यवस्था छिपी है। स्कूल के बाहर बोर्ड पर ‘Excellence’ लिखा है, लेकिन अंदर अगर नतीजे 32 प्रतिशत तक सिमट रहे हैं तो यह ‘Excellence’ नहीं, शिक्षा व्यवस्था पर व्यंग है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या जिला शिक्षा विभाग बच्चों का भविष्य बना रहा है, या सिर्फ आंकड़ों और प्रचार की चमक से सच्चाई छिपा रहा है? क्या सरकारी स्कूलों को सुधारने की कोशिश हो रही है या सिर्फ फाइलों में सफलता की कहानी लिखी जा रही है?

हालांकि अभी तक इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन शिकायतों, सूत्रों और विभाग की चुप्पी ने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। और ये सवाल तब तक खड़े रहेंगे जब तक शिक्षा विभाग साफ-साफ जवाब नहीं देता।

हम इस खबर को अभी यहीं नहीं छोड़ेंगे। बहुत जल्द इस पूरे मामले को सबूत और तथ्यों के साथ आपके सामने लाया जाएगा, ताकि सच सामने आए—कि सरायकेला की शिक्षा व्यवस्था में सुधार हो रहा है या सिर्फ सुधार का दिखावा। क्योंकि सवाल सिर्फ एक अधिकारी पर लगे आरोपों का नहीं है, सवाल उन बच्चों के भविष्य का है जिनके सपने सरकारी स्कूलों के भरोसे हैं। अगर शिक्षा के मंदिर में ही अंधेरा होगा, तो आने वाली पीढ़ी रोशनी कहाँ से पाएगी?”

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